छठ पूजा 2025: सूर्य उपासना और आस्था का पर्व
भारत की संस्कृति में त्यौहार सिर्फ उत्सव नहीं होते, बल्कि वे जीवन के दर्शन, श्रद्धा और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक होते हैं। Chhath Puja 2025, जो सूर्य देव और छठी मइया की आराधना का पर्व है।
यह चार दिनों तक चलने वाला पर्व मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्र में मनाया जाता है, लेकिन अब इसकी आस्था देश और विदेश तक फैल चुकी है।
छठ पूजा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें उगते और डूबते दोनों सूर्य की पूजा की जाती है। यह प्रकृति और जीवन के चक्र का सम्मान करने की परंपरा है — जब इंसान अपने अस्तित्व के मूल स्रोत “सूर्य” के प्रति आभार व्यक्त करता है।
छठ पूजा(Chhath Puja 2025) का इतिहास
छठ पूजा का इतिहास हजारों वर्षों पुराना है। वैदिक काल में सूर्य देव की उपासना को आरोग्य, समृद्धि और संतुलन का प्रतीक माना गया।
महाभारत में उल्लेख मिलता है कि कुंती पुत्र कर्ण, जो सूर्य देव के पुत्र थे, प्रतिदिन नदी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे। वे अपने जीवन की शक्ति और तेज का श्रेय सूर्य को देते थे।
इसी प्रकार रामायण में भी छठ पूजा का उल्लेख है — जब भगवान राम और माता सीता ने राज्याभिषेक के बाद अयोध्या में सूर्य देव और छठी मइया की पूजा की थी।
समय के साथ यह परंपरा लोक संस्कृति का हिस्सा बन गई और आज भी करोड़ों लोग श्रद्धा से इसका पालन करते हैं।
छठ पूजा( Chhath Puja 2025)का धार्मिक और सामाजिक महत्व
छठ पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह शरीर, मन और आत्मा की शुद्धि का माध्यम है।
इसमें जल, सूर्य और धरती जैसे प्राकृतिक तत्वों की पूजा की जाती है। मूर्तियों की बजाय प्रकृति के वास्तविक रूप को पूज्य माना जाता है।
छठ व्रत संयम, अनुशासन और आत्म-बल की परीक्षा है — व्रती कई दिनों तक उपवास रखता है, शुद्धता का पालन करता है और अपने परिवार तथा समाज की भलाई के लिए प्रार्थना करता है।
इस पर्व का वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी गहरा है। सूर्य की किरणों में जीवन ऊर्जा होती है, जो स्वास्थ्य और मनोबल को बढ़ाती है।
छठ पूजा के दौरान जल में खड़े होकर सूर्य की किरणें ग्रहण करने से शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
छठ पूजा के चार दिन: पूरी विधि और परंपरा
पहला दिन – नहाय-खाय (27 अक्टूबर 2025)
छठ पूजा की शुरुआत “नहाय-खाय” से होती है। इस दिन व्रती (व्रत रखने वाले व्यक्ति) सुबह जल्दी उठकर नदी या तालाब में स्नान करते हैं और घर की पूरी सफाई करते हैं।
वे दिनभर सादा भोजन करते हैं — आमतौर पर लौकी-चने की दाल और चावल, जो शुद्ध घी में बनाया जाता है।
इस दिन का उद्देश्य शरीर और मन की पवित्रता है। इसे छठ व्रत की नींव माना जाता है।
दूसरा दिन – खरना या लोहंडा (28 अक्टूबर 2025)
इस दिन व्रती पूरे दिन निर्जला उपवास रखते हैं और सूर्यास्त के बाद खरना का प्रसाद तैयार करते हैं।
खरना में गुड़ और दूध से बनी खीर, रोटी और केले का प्रसाद बनाया जाता है।
व्रती पहले सूर्य देव को अर्पण करते हैं और फिर घर-परिवार व पड़ोसियों में बांटते हैं।
खरना के बाद व्रती 36 घंटे का निर्जला उपवास शुरू करते हैं — न जल, न भोजन। यह आत्म-संयम और श्रद्धा की पराकाष्ठा है।
तीसरा दिन – संध्या अर्घ्य (29 अक्टूबर 2025)
तीसरा दिन छठ पूजा का सबसे भावनात्मक और आकर्षक चरण होता है।
संध्या के समय व्रती अपने परिवार और समुदाय के साथ नदियों, तालाबों या घाटों पर पहुँचते हैं।
बाँस की टोकरी (सोप) में ठेकुआ, गन्ना, नारियल, केले, मौसमी फल, चावल और दाल के प्रसाद सजाए जाते हैं।
महिलाएँ साड़ी या पारंपरिक वस्त्र धारण करती हैं, जल में खड़ी होकर डूबते सूर्य को अर्घ्य देती हैं और छठी मइया से अपने परिवार की सुख-समृद्धि और संतान की लंबी उम्र की प्रार्थना करती हैं।
आज का सूर्यास्त समय:
पटना (बिहार): शाम 5:12 बजे
लखनऊ (उत्तर प्रदेश): शाम 5:10 बजे
यह दृश्य असीम श्रद्धा और सौंदर्य का प्रतीक होता है — जब हजारों दीपकों की रोशनी घाटों पर झिलमिलाती है और सूर्य की लालिमा पानी पर प्रतिबिंबित होती है।
चौथा दिन – उषा अर्घ्य (30 अक्टूबर 2025)
अंतिम दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में व्रती परिवार सहित नदी या तालाब के तट पर पहुँचते हैं और उगते सूर्य को अर्घ्य देते हैं।
यह अर्घ्य जीवन में नई शुरुआत, उम्मीद और प्रकाश का प्रतीक है।
सूर्य की पहली किरण जब जल पर पड़ती है, तो वातावरण भक्ति और ऊर्जा से भर जाता है।
अर्घ्य के बाद व्रत का समापन होता है और व्रती घर लौटकर प्रसाद ग्रहण करते हैं।
बिहार में छठ पूजा का सांस्कृतिक महत्व
बिहार में छठ पूजा न केवल धार्मिक पर्व है बल्कि सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है।
गांव-गांव में घाटों की सफाई होती है, लोग एक-दूसरे की मदद करते हैं, महिलाएँ लोकगीत गाती हैं —
“कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए…”
यह सामूहिकता, सादगी और सहयोग का त्योहार है।
यहां छठ पूजा केवल पूजा नहीं, बल्कि एक सामाजिक पर्व बन चुकी है जो पीढ़ियों को जोड़ता है।
छठी मइया का स्वरूप और आस्था
छठी मइया को सूर्य देव की बहन माना गया है।
वह संतानों की रक्षक देवी हैं जो बच्चों की दीर्घायु और परिवार की समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं।
व्रती जब जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देता है, तो वह केवल प्रकृति की पूजा नहीं करता — बल्कि मातृत्व, सृजन और जीवन के स्रोत को प्रणाम करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: छठ पूजा कौन कर सकता है?
उत्तर: यह पर्व सभी के लिए खुला है। कोई भी व्यक्ति, चाहे स्त्री हो या पुरुष, श्रद्धा से व्रत रख सकता है।
प्रश्न 2: उपवास की अवधि कितनी होती है?
उत्तर: खरना के बाद लगभग 36 घंटे का निर्जला उपवास रखा जाता है।
प्रश्न 3: छठ पूजा का वैज्ञानिक महत्व क्या है?
उत्तर: सूर्य की किरणें शरीर को विटामिन D देती हैं और मानसिक शांति प्रदान करती हैं। जल में खड़े होकर सूर्य की किरणें ग्रहण करने से शरीर में संतुलन और ऊर्जा बनी रहती है।
प्रश्न 4: छठी मइया कौन हैं?
उत्तर: छठी मइया सूर्य देव की बहन मानी जाती हैं। वे संतानों की रक्षा और परिवार के कल्याण की देवी हैं।
प्रश्न 5: छठ पूजा के मुख्य प्रसाद कौन-कौन से हैं?
उत्तर: ठेकुआ, खीर, चावल-दाल, गन्ना, मौसमी फल, नारियल, और केला।
छठ पूजा(Chhath Puja 2025) की शुभकामनाएँ
“सूर्य देव की किरणें आपके जीवन को प्रकाशित करें,
छठी मइया का आशीर्वाद आपके परिवार को स्वस्थ, समृद्ध और खुशहाल बनाए।
छठ पूजा 2025 की हार्दिक शुभकामनाएँ!”
निष्कर्ष
छठ पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, स्वास्थ्य और मानवीय मूल्यों का उत्सव है।
इस पर्व में संयम, स्वच्छता, भक्ति और कृतज्ञता का अद्भुत मेल देखने को मिलता है।
जब पूरा समाज घाटों पर खड़ा होकर सूर्य को प्रणाम करता है, तो वह दृश्य एकता, आशा और आस्था का प्रतीक बन जाता है।
छठ पूजा हमें सिखाती है कि जीवन में रोशनी लाने के लिए पहले हमें भीतर की अंधकार मिटानी होगी।
यही छठ का सार है — प्रकाश, शांति और संतुलन की ओर यात्रा।

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